बुध्द का धम्मं !!

बुध्द का धम्मं !!





बुध्द ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। संदेह और शून्य के बिच में बुध्द का सारा बोध है। संदेह को धम्मं का आधार बनाया और शून्य को धम्मं की उपलब्धि। बाकी सब धर्म विश्वास को आधार बनाते है और पूर्ण को उपलब्धि। बुध्द धम्मं को समझने के लिए जिज्ञासा चाहिए। बुद्ध कहते है, माननेसे नहीं चलेगा। गहरी खोज करनी पड़ेगी। दूसरे धर्म कहते है की, पहला कदम बस तुम्हारे भरोसे की बात है, उठा लो, इससे ज्यादा आपको कुछ करने की जरुरत नहीं है। लेकिन बुध्द का धम्मं तो तुमसे पहले कदम पर पहुचने के लिए भी बड़ी लंबी यात्रा की मांग करता है। वह कहता है, संदेह की प्रगाढ़ अग्नि में जलना होगा, क्योकि तुम जो भरोसा करोगे. वह तुम्हारे बुध्दी पर का भरोसा होगा।  अगर बुध्दी  में ही रोग है तो उस रोग से जन्मा हुवा विश्वास भी बिमार होगा।


 


मंदिर अंधेरेमे ही नहीं पड़े है वे अँधेरे की सुरक्षा स्थल है। आस्था के नाम सब तरह के पाप वहां चलते है। विश्वास के नीछे सब तरह का झूठ चलता है।  धर्म पाखण्ड है क्योकि शुरुवात में ही चूक हो जाती है।  क्योकि पहले कदम पर ही तुम कमजोर पड जाते हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हे पार न ले जा सकेगा. इसीलिए बुध्द ने कहा तोडो विश्वास, छोडो विश्वास.सब धारणाए गिरा देनी है। संदेह की अग्नि में उतरना है। दुस्साहसी चाहिए, खोजी चाहिए, अन्वेषक चाहिए, चुनौती स्वीकार करने का साहस निर्माण होना चाहिए.


 


बुध्द कहते है, आश्वासन कोई भी नहीं है क्योकि कोण तुम्हे आश्वासन देगा?। यहाँ कोई भी नहीं है जो तुम्हारा हाथ पकडे। अकेले ही जाना है मरते वक्त तक।  बुध्द ने कहा अप्प दीप भव! अपने ही दीए बनो। मै मरा तो रो मत।  मै कोण हू? मै आपको ज्यादा से ज्यादा दिशा दे सकता हू। चलना तुम्हे है।  मै रहू तो भी चलना तुम्हे है, अगर न रहू तो भी चलना तुम्हे है। झुको मत, सहारा लेना मत, क्योकि सब सहारे अंत:ता लंगड़ा बना देते है। सब सहारे तुम्हे अंधा बना देते है। सहारे धीर धीरे तुम्हे कमजोर कर देते है। बैसाखिया धीर धीरे तुम्हारे पैरों की परिपूर्ति कर देती है।  फिर तुम पैरों की फ़िक्र ही छोड़ देते हो।


 



बुध्द कहते है, संदेह करो, बुध्द का धम्मं वैज्ञानिक है। संदेह विज्ञान प्राथमिक चरण है। इसीलिए भविष्य में जैसे जैसे लोकमानस वैज्ञानिक होता जाएगा, वैसे वैसे समय बुध्द के अनुकूल होता जाएगा।  जैसे जैसे लोग सोचने और विचारने की गहनता में उतरेंगे और उधार और बासे विश्वास न करेंगे, हर किसी बात को मान लेने को राजी न होंगे, बगावत बढ़ेगी, लोग हिम्मती होंगे, विद्रोही होंगे, वैसे वैसे बुध्द की बात लोगो के करीब आने लगेगी।


 


जगत में बुध्द का आदर बढ़ रहा है।  जो भी विचारक है, चिन्तक है, वैज्ञानिक है, उनके मन में बुध्द का आदर रोज बढ़ रहा है। बुध्द बिना लड़े जित रहे है।  क्योकि बुध्द कहते है, हम तुमसे मानने को नहीं कहते, खोजने को कहते है। जब खोज लोंगे तो मानेंगे, बिना खोजे कैसे मान लोंगे. यह विज्ञान का सूत्र है।


 


सत्य इतना सस्ता नहीं है, की वह बिना खोजे मिल जाए। सत्य कोई संपति नहीं है, जैसे पिता की वसीयत मरने के बाद पुत्र को मिल जाती है।  बुद्ध कहते है, सत्य को खोजना पड़ेगा. भ्रम जाल तथा माया को भुलाकर उसे ढूंढना होगा और तुम्हारे भीतर भी कमजोरिया बहुत है। थक जाते तो कही भी भरोसा करके रुक सकते हो, किसी भी मंदिर के सामने, थके हारे सर झुका सकते हो, इसीलिए नहीं की तुम्हे कोई  जगह मिल गयी, जहा सर झुकाने का मुकाम आ गया था, बस सिर्फ  इसीलिए की अब तुम थक गए, अब और नहीं खोजा जाता. बुध्द तुम्हे कोई जगह नहीं देते, तुम्हारे कमजोरी के लिए वह कोई जगा नहीं होती।  बुध्द कहते है, ज्ञान तो मिलाता है, आत्म परिष्कार से, शास्त्र से नहीं, सत्य कोई धारना नहीं है। सत्य कोई सिध्दांत नहीं है। सत्य तो जीवन का निखार है। सत्य तो ऐसा है, जैसे सोने को कोई आग में डालता है तो निखरता है, जलाता है, पिघलता है, तड़पाता है।  व्यर्थ जल जाता है, सार्थक बचाता है।  सत्य तो तुममे है, कूड़े करकट में दबा है और जबतक तुम आग से न गुजरो, तुम उस सत्य को कैसे खोज पाओगे.?


 


बुध्द कहते है, जल्दी मत करना भरोसे करने की, भरोसा तभी करना जब संदेह करने की जगह ही न रह जाए, लेकिन दूसरे धर्म संदेह के विपरीत केवल भरोसा करनेकी सलाह देते है।  संदेह के विपरीत श्रध्दा करनेकी सलाह देते है।  लेकिन बुध्द संदेह करने की पूरी छूट देते है। इतना संदेह करो की, आखिर में तुम्हारा संदेह नष्ट हो जाए और केवल परिणाम बच जाए, जिसे तुम ढूढ रहे हो।  बुध्द कहते है, दबे हुए सड़े को बाहर निकालो, उससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, उसे रोशनी में लाओ।


 



बुध्द ने संदेह को जन्म दिया है। बुध्द का युग कभी भी बुद्धिवादी नहीं था।  केवल बुध्द ही बुध्दिवादी थे।  उन्होंने लंबे और कठिन मार्ग से यात्रा की थी। शार्टकट मार्ग की कोइ गुंजाइश नहीं थी।  तुम जिसे श्रध्दा मानते हो, वह शार्टकट का रास्ता है। तुम बिना गए, बिना कही पहुचे, बिना कुछ किये श्रध्दा कर लेते हो।  ऐसी श्रध्दा नपुसकता  के सिवा कुछ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र लिखते है, नास्तिकोकी बाते मत सुनना, नास्तिक कुछ कहे तो कान में उंगलिया डाल देना।  यह तो भयभितता है।  डरपोकता के सिवा कुछ नहीं है। ऐसे धर्म के शास्त्र कमजोरी सिखाते है, जो आस्था इतनी डरपोक है की नास्तिक की बात सुनाने से कापती हो।  इससे तो नास्तिक बेहतर है, कम से कम उनके शास्त्र में कही नहीं लिखा की आस्तिक की बात सुनने ने से डरना है। नास्तिक कभी डरता नहीं है, लेकिन आस्तिक हमेशा डरते है।


 



बुध्द ने संदेह को जन्म दिया है, संदेह करते करते तूम संदेह से मुक्ति पा लेते हो।  जहा संदेह खत्म होता है वहा सूरज उगता है। परमात्मा असहाय अवस्था की पुकार होती है। जिसको तुमने झुकना समझा है, वह कही तुम्हारे कांपते और भयभीत पैरों की कमजोरी तो नहीं है। जिसको तुमने समर्पण समझा है, वह तुम्हारी कायरता तो नहीं?.


 



बुध्द ने तुमसे परमात्मा नहीं छिना, उन्होंने तुमसे तुम्हारी बेचारगी छिनी है। बुध्द ने तुमसे मंदिर नहीं छीने, तुम्हारे कमजोरी के शरणस्थल छीने है। बुध्द ने कहा, तुम्हे खुद ही चलना है, बुध्द ने तुम्हारे पैरों को सदियों सदियों के बाद फिर से खून दिया है। तुम्हे अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी है।  बुध्द उसी को सदधर्म कहते है, जो तुम्हे तुम्हारे भीतर छिपे हुए सत्य से परिचित कराए। झूठी आस्थाओ में नहीं, धारानाओ में नहीं, शास्त्रों में नहीं, व्यर्थ के शब्दजालो में नहीं।


 


बुध्द ने आत्मा के स्वरूप को शून्य कहा है। उन्होंने आत्मा शब्द में खतरा देखा. क्योकि उन्हें लगा तुम किसी चीज के तलाश में हो, जो भीतर रखी है। जब तुम कहते हो तुम्हारे भीतर आत्मा है, जैसे की तुम्हारे घर में कुर्सी रखी हो, तुम्हारे भीतर आत्मा रखी है, आत्मा कोई वस्तु है की गए भीतर और पा गए। बुध्द ने आत्मा शब्द का शब्दप्रयोग नहीं किया क्योकि आत्मा से जडता का पता लगता है। आत्मा शब्द का मतलब यह हुवा की कुछ तुम्हारे भीतर ठहरा हुवा है, रुका हुवा है, कुछ तुम्हारे भीतर मौजूद है।  तो जो मौजूद ही ही है, वह जड है।


 


बुध्द ने कहा था, तुम ही तुम्हारे शास्ता हो, तूम ही तुम्हारे गुरु हो, तुम ही तुम्हारे शास्त्र हो और तुम्हारे चैतन्य के शिवाय और कोई नहीं है।




लेखं- देव भिवसने सर.



एकविसाव्या शतकातील स्त्री !!

एकविसाव्या शतकातील स्त्री !!





धार्मिक, दहशतवादी मग ते कोणत्याही धर्माचे असोत. इराणचा खोमेनी असो, अफगाणिस्ताना ओसामाबिन लादेन असो, बाबरी मशिद उद्ध्वस्त करणारॊ हिंदू अतिरेकी संघटन अथवा अमेरिकेतील वर्ल्ड ट्रेड सेंटर उडवून देणारे अतिरेकी. हे सर्व एकाच माळेचे मणी आहेत. या सर्व दहशतवाद्यांनी स्त्रिला वेठीस धरण्याचाच पवित्रा घेतला आहे.


 


आई, बाबा मला मारु नका. मला जगायचंय. मी तुमचीच मुलगी आहे. मग, मला असे दूर का लोटता ? हे हृदयाला पाझर फोडणारे उद्गार अहेत. स्त्री पिंडाचे ( स्त्री भ्रूणाचे) आपण २१ व्या शतकात पदार्पण केले. चंद्रावर जाण्यासाठी म्हणे, बुकींगसुद्धा सुरु आहे. विज्ञान-तंत्रज्ञानासारख्या उच्च क्षेत्रात प्रगती केली, पण आजही आपले विचार निच दर्जाचे आहेत. मुलगा न झाल्यास मुलगी झाल्यास आई-वडील शोक करतांना दिसतात. ज्याच्या पदरी पाप त्याला मुली आपोआप हिच भावना लोकांच्या मनात आहे.


 


म्हणूनच स्त्री भ्रूणहत्या मोठ्या प्रमाणावर होत आहे. सध्यातर असे पाहण्यात येत आहे की, दुसरे अपत्य असलेल्या (?) मुलींची संख्या ( १००० मुलांचे ) मागे ७५९ आहे. तर प्रत्येक हजार पुरुषांमागे १९९१- ९४५ तर २००१ – ९२७ स्त्रियांची संख्या आहे.


 


बालपणीपासून असा भेदभाव केला जातो. मुलांना दिली जाणारी खेळणीसुद्धा न्यूनगंडाची भावना निर्माण करतात. मुलांना मोटार, विमान अशी खेळणी दिली जातात, तर मुलींना बाहुली दिली जाते. स्त्री ही व्यक्तीत्व नव्हे, ती एक वस्तू खेळणी आहे. याची जणू ही पहिली शिकवणच असते. लहानपणी घरात सती सावित्री, पार्वती, सीता यांच्या गोष्टीघरात सांगितल्या जातात. पार्वती पतिव्रता होती, हे नेहमी मनावर बिंबवले जाते, पण तिचा कणखरपणा, तिची जिद्द याची वाखाणणी कोणीच करीत नाही.


 


बाजारतही वस्तूची खरेदी-विक्री होते. त्याचप्रमाणे स्त्री सुद्धा एक बाजारातील वस्तू समजून तिची बिनधास्तपणे खरेदी-विक्री चालू आहे. खरे पाहिले तर या जगाच्या रथाची दोन चाके म्हणजे स्त्री आणि पुरुष. हा रथ व्यवस्थितपणे चालवायचा असेल तर दोन्ही चाके सारख्याच गतीने चालण्यासाठी स्त्री रुपी चालाका सक्षम बनविणे अत्यावश्यक आहे. स्त्री स्वतःचे रक्षण करण्यास समर्थ असली पाहिजे. खेड्यातच काय पण अगदी शहरात सुद्धा संध्याकाळी साडे सहा-सात वाजता बाजूच्या दुकानात जायचे तरी १८ वर्षाच्या बहिणीबरोबर ९-१० वर्षाच्या भावाला पाठविले जाते. जोपर्यंत स्त्री अशी रक्षणीय मानली जाईल, तोपर्यंत तिला स्वातंत्र्य मिळाले, असे म्हणता येणार नाही.


 

लेकीचा ग जलम । भाड्याचा बईल
कधी इसावा हुईल । देवा ठावं
लेकीचा ग जलम । देव देऊनी चुकला
बैल घाण्याला उपला । जलमभरी



 

या ओळीतूनच भारतीय स्त्रीची, विशेषतः ग्रामीण स्त्रीची किती दुरवस्था झाली आहे हे स्पष्ट होते.


 


स्त्रीवर होणाऱ्या या सर्व अत्याचाराचे तिच्या दुःस्थितीचे कारण म्हणजे शिक्षणाचा अभाव. संपूर्ण मानवजातीच्या विकासासाठी मुलींच्या शिक्षणाइतके परिणमकारक दुसरे साधन नाही. एका मुलीला शिकवणे म्हणजे अख्या कुटुंबाला शिकविण्यासारखे आहे. स्त्रियांपुढे गंभीर समस्या आहेत, पण शिक्षण या जादूच्या कांडीने सोडविली जाणार नाही. अशी एकही समस्या नाही. त्यासाठी समाजाचा स्त्रीकडे पाहण्याचा दृष्टीकोन बदलला पाहिजे. स्त्री ही त्याग नम्रता, श्रद्धा व सुजाणपणा याची मूर्ती आहे. ती कोणत्याच बाबतीत पुरुषांपेक्षा कमी नाही. पारंपारिकरित्या पुरुषांची समजली जाणारी क्षेत्रे आता महिला काबीज करीत आहेत. राजमाता जिजाऊ, तारामाई शिंदे,सावित्रीमाई फुले, इंदिरा गांधी यांच्या पावलावर पाऊल ठेवून किरण बेदी, मीरा बोरवणकर, अंजू जॉर्ज, सानिया मिर्झा आपापल्या क्षेत्रात कर्तृत्व गाजवत आहेत. तसेच पोलिस, लष्करी दल याबरोबरच रिक्षा, ट्रक चालविणे, पेट्रोल पंपावर काम करणे, पत्रकारिता ही कामे महिला करु लागल्या आहेत.


 


स्त्रीची प्रतिष्ठा फक्त वीर पत्नी अथवा वीर माता होण्यात नाही, तर वीर स्त्री होण्यास आहे. त्यासाठी आपणा सर्वांना सांगू इच्छिते, मुलीनो….  हे शतक तुमचे आहे. संधी गमावू नका. पुढे या आणि तुमची सकारात्मता, मौलिकता जगाला दाखवा, स्वतःला सिद्ध करावे जगाला पटवून द्या.


 

हमसे है जमाना सारा
हम जमाने से कम नही,
Girls the best जानलो बात यह मानलो.



लेखं- सीमा लिंगायत.


फातिमा शेख... पहली मुस्लीम शिक्षिका !!

फातिमा शेख... पहली मुस्लीम शिक्षिका !!

 






आज से लगभग १५० सालों तक भी शिक्षा बहुसंख्य लोगों तक नहीं पहुँच पाई थी. जब विश्व आधुनिक शिक्षा में काफी आगे निकल चूका था लेकिन भारत में बहुसंख्य लोग शिक्षा से वंचित थे. लडकियों की शिक्षा का तो पूछो मत क्या हाल था. क्रांतीसुर्य जोतीराव फुले पूना में १८२७ में पैदा हुए. उन्होंने बहुजनो की दुर्गति को बहुत ही निकट से देखा था. उन्हें पता था की बहुजनों के इस पतन का कारण शिक्षा की कमी ही है. इसी लिए वो चाहते थे कि बहुसंख्य लोगों के घरों तक शिक्षा का प्रचार प्रसार होना ही चाहिए. विशेषतः वो लड़कियों के शिक्षा के जबरदस्त पक्षधर थे. और इसका आरंभ उन्होंने अपने घर से ही किया. उन्होंने सब से पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया. जोतीराव अपनी पत्नी को शिक्षित बनाकर अपने कार्य को और भी आगे ले जाने की तय्यारियों में जुट गए.



 

ये बात उस समय के सनातनियों को बिलकुल भी पसंद नहीं आई. उनका चारों ओर से विरोध होने लगा. जोतीराव फिर भी अपने कार्य को मजबूती से करते रहे. जोतीराव नहीं माने तो उनके पिता गोविंदराव पर दबाव बनाया गया. अंततः पिता को भी प्रस्थापित व्यवस्था के सामने विवश होना पड़ा. मज़बूरी में जोतीराव फुले को अपना घर छोड़ना पडा. उनके एक दोस्त उस्मान शेख पूना के गंज पेठ में रहते थे. उन्होंने जोतीराव फुले को रहने के लिए अपना घर दिया. यहीं जोतीराव फुले ने अपना पहला स्कूल शुरू किया. उस्मान शेख भी लड़कियों की शिक्षा के महत्व को समझते थे. उनकी एक बहन फातिमा थीं जिसे वो बहुत चाहते थे. उस्मान शेख ने अपनी बहन के दिल में शिक्षा के प्रति रूचि निर्माण की. सावित्रीबाई के साथ वो भी लिखना पढना सिखने लगीं. बाद में उन्होंने शैक्षिक सनद प्राप्त की.





 

क्रांतीसुर्य जोतीराव फुले ने लड़कियों के लिए कई स्कूल कायम किये. सावित्रीबाई और फातिमा ने वहां पढ़ाना शुरू किया. वो जब भी रास्ते से गुज़रतीं तो लोग उनकी हंसी उड़ाते और उन्हें पत्थर मारते. दोनों इस ज्यादती को सहन करती रहीं लेकिन उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया. फातिमा शेख के ज़माने में लडकियों की शिक्षा में असंख्य रुकावटें थीं. ऐसे ज़माने में उन्होंने स्वयं शिक्षा प्राप्त की. दूसरों को लिखना पढना सिखाया. वो शिक्षा देने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं जिन के पास शिक्षा की सनद थी. फातिमा शेख ने लड़कियों की शिक्षा के लिए जो सेवाएँ दीं, उसे भुलाया नहीं जा सकता. घर घर जाना, लोगों को शिक्षा की आवश्यकता समझाना, लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए उनके अभिभावकों की खुशामद करना, फातिमा शेख की आदत बन गयी थी. आखिर उनकी म्हणत रंग आने लगी. लोगों के विचारों में परिवर्तन आया.वो लड़कियों को स्कूल भेजने लगे|लडकियों में भी शिक्षा के प्रति रूचि निर्माण होने लगी. स्कूल में उनकी संख्या बढती गयी. मुस्लिम लड़कियां भी ख़ुशी ख़ुशी स्कूल जाने लगीं.









(सावित्रीमाई फुले और फातिमा शेख जी  अपनी स्कूल की २ छात्राओ के साथ... १०० वर्षापूर्वी निगेटीवरून तयार केलेले हे दुर्मिळ छायाचित्र.)



विपरीत परिस्थितियों में प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में जाकर शिक्षा के महान कार्य में जोतीराव एवं सावित्रीबाई फुले को मौलिक साथ सहयोग देने वाली पहली मुस्लिम शिक्षिका फातिमा शेख को दिल से सलाम !!




लेखं- शेख जबीर सर.


'सोशल नेटवर्किंग फॉर सोशल कॉज' या संघटनेच्या माध्यमातून पदमश्री नामदेव ढसाळ संराना त्यांच्या आजारपणासाठी मदत निधी प्रदान !!

'सोशल नेटवर्किंग फॉर सोशल कॉज' या संघटनेच्या माध्यमातून पदमश्री नामदेव ढसाळ संराना त्यांच्या आजारपणासाठी मदत निधी प्रदान !! 
 



 

सोशल नेटवर्किंग फॉर सोशल कॉज या माध्यमातून आजवर आपण अनेक उपक्रम राबवले आहेत. महाराष्टातच नव्हे तर बाहेरच्या राज्यात देखील आपले कार्य पोहोचले आहे. याच श्रुंखलेत अजून एका उपक्रमाच्या माध्यमातून आपणा सर्वांना अतिशय आनंद होइल असे काम फेसबूकवर्रील मित्र-मैत्रिणीनी करून दाखवले आहे.




 

मध्यंतरात श्री ढोणे यांनी पद्मश्री नामदेव ढसाळ हे कॅन्सरने आजारी असून त्यांना आर्थिक मदतीची गरज असल्याच्या IBN लोकमतच्या बातमीची लिंक पाठवली होती. त्यासोबतच सोशल नेटवर्किंग अभियानाच्या माध्यमातून आपण काही मदत उभारणार असू तर स्वतः मदत करण्याची तयारी दर्शवली. डॉ.उत्तम फरताळे यांनी पुढील कार्यासाठी पाठवलेला अॅडव्हान्स बॅंकेत जमा होताच. या बळावर मदत निधीला सुरूवात केली. निलेश कळसकर यांच्या मेहेनतीने या कामाला मोठा हातभार लावला. गंभीर आजाराला मदत करण्यासाठी उभ्या राहिलेल्या या उपक्रमासाठी दि. २३ आक्टोंबर पर्यंत जमा झालेला ५०,००० रुपये निधी आपण Bomby हॉस्पिटल, मुंबईला जाउन ढसाळ सरांच्या हाती स्वाधीन केला आहे. लक्ष्मीकांत पोवनीकर, संध्या चौगुले, उज्वल गोडबोले , वर्षा डोळस, विनोद गहाणे आणि इतर काही मित्र-मैत्रिणीच्या या सर्वांच्या सहकार्यातून आणि सहभागातून जमा झालेले ५०,००० रुपये थोर कवि नामदेव ढसाळ यांच्या शस्त्रक्रीयेसाठी त्यांना सुपूर्द करण्यात आले. (काही मित्र-मैत्रिणींची नावे बॅंक स्टेटमेंट मध्ये आली नाहीत)






 

हॉस्पीटल मध्ये देखील ढसाळ सरांचे लिखाण अविरत चालू असल्याचे बघून या माणसाचे लेखणीवरील प्रेम लक्षात येवू शकेल. त्यांच्या अडचणीत त्यांना मदत करू शकलो या पेक्षा त्यांच्यासारख्या ग्रेट माणसाची भेट झाल्याचा जास्त आनंद टीमच्या सदस्यांना झाला... हेतू स्वच्छ असेल तर कोणतेही कार्य निश्चित सिद्धीस जाते हे सोशल नेटवर्किंग फॉर सोशल कॉज या अभियानंतर्गत आपण सर्वांनी मिळून सिद्ध करून दाखवले. विद्रोही कवी पदमश्री नामदेव ढसाळ यांच्या आम्ही नामदेव ढसाळ सर आणि त्यांच्या पत्नी मल्लिका अमर शैख यांची भेट घेतली. नामदेव सरांनी अगदी मनमोकळ्या गप्पा केल्या आम्हाला त्यांच्या आगामी काव्यसंग्रहाच्या २ कविता वाचून दखवल्या. फेसबुकवरील मित्रांचा-मैत्रीणीना सततचा सहभाग आणि विश्वास यामुळे अभियानातील जवळपास प्रत्येक कार्य आपण यशस्वी केले आहे. याचे सर्व श्रेय आपल्या सर्वांनाच आहे यात माझ्या मनात कोणतीही शंका नाही... अभियानातील सक्रीय सदस्य आणि सातत्याने मदत करणार्या सर्व मित्रांना... मैत्रीणीना माझे प्रणाम... 





विद्रोही कवी ढसाळ सरांना भेटायला सोशल नेटवर्किंग फॉर सोशल कॉज प्रमुख- प्रमोद गायकवाड सर, निलेश कळसकर, जितेंद्र माने, गौरव गायकवाड, अनुराधा नारकर, वैभव छाया, सुनील गजाकोश हे हजर होते.



 

फेसबुकच्या माध्यमातून सामाजिक भान जपण्याच्या आपल्या वाटचालीतील हे अजून एक पाउल आपणा सर्वांना समाधान देवून गेले असेल याची मला खात्री आहे... सर्व सहभागी मित्रांचे मनपूर्वक धन्यवाद आणि अभिनंदन !!



- सोशल नेटवर्किंग फॉर सोशल कॉज प्रमुख- प्रमोद गायकवाड सर.

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी राष्ट्रहिताच्या दृष्टिकोनातून लहान राज्यांसंबंधी जे विचार मांडले होते !!

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी राष्ट्रहिताच्या दृष्टिकोनातून लहान राज्यांसंबंधी जे विचार मांडले होते !!



 


भाषावार प्रांतरचनेच्या प्रश्‍नावर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांची दोन पुस्तके प्रकाशित आहेत. पहिले १९४८ मध्ये "मराठी भाषकांचा महाराष्ट्र" हे पुस्तक म्हणजे भाषावार प्रांत कमिशनकडे सादर केलेले निवेदन आहे. व १९५५  मध्ये 'Thoughts on Linguistic State' द्वारा नव्याने मांडणी केलेली आहे व भाषावार प्रांतरचना या विषयावर "जनता"मध्ये बाबासाहेबांनी दोन लेख लिहिलेले आहेत. भाषावार प्रांतरचना हा लेख २ मे १९५३ रोजी व दुसरा लेख २ जून १९५६  रोजी महाराष्ट्राची दोन राज्य करावीत यावर लिहिला. १९४८ आणि १९५५ मध्ये लिहिलेल्या पुस्तकात काही विधानाबाबत विसंगती जाणवते. परंतु याच पुस्तिकेत जबाबदार व्यक्तीला चुकीची दुरुस्ती करता आली पाहिजे. पुनर्विचार करण्याचे आणि तीनुसार मतांतर करण्याचे धाडसही त्यांच्या अंगी असावे लागते, असे स्पष्टीकरण आहे.



 


जगातील सर्वच घटनाकारांसमोर आपापल्या देशाला एकसंध कसे ठेवायचे आणि राष्ट्राचे विघटन होऊ नये यासाठी घटनात्मक विनिमयाद्वारा काही खंबीर तरतुदी कशा करायच्या, हा एक जटिल प्रश्‍न असतो. एकतर भारतात अनेक संस्थानिकांची राज्ये होती आणि त्यांपैकी प्रत्येक स्वतःला सार्वभौम समजत होते. त्यामुळे ती राज्ये सतत त्यांच्या स्वतंत्र अस्तित्वाची मागणी करीत होती. काश्‍मीरचा राजा हरिसिंह आणि हैदराबादचा निजाम ही त्यांची ठळक उदाहरणे आहेत. हे सर्व प्रश्‍न सोडविण्याच्या दृष्टीने आंबेडकरांनी घटनेद्वारा जे संघराज्य स्थापन केले, त्याचे स्वरूप परंपरागत संघराज्याच्या कल्पनेपेक्षा पूर्णपणे वेगळे होते. त्यामुळे बाबासाहेबांनी राज्यघटनेत संघराज्य ऋशवशीरींळेप असा शब्द न वापरता Union of the states असा शब्द वापरला आहे. याचा अर्थ, भारत हा मुळातच एक एकसंध देश आहे आणि त्यातील राज्यांची निर्मिती ही प्रशासकीय सोयीसाठी केलेली आहे.



 


भारताच्या सुरक्षेसाठी आणि एकात्मतेसाठी भारताची दक्षिण आणि उत्तर अशी जी विभागणी झाली, तिला डॉ. आंबेडकरांचा विरोध होता. त्यांच्या मतानुसार भारताची एकता आणि अखंडता अधिक प्रभावी करण्यासाठी जोपर्यंत प्रत्येक भारतीयाने प्रांतीय, व विभागीय ज्या भावनात्मक गोष्टी आहेत त्या दूर केल्या पाहिजेत व त्यासाठी भारताच्या सर्वांगीण विकासासाठी राज्यांची पुनर्रचना करणे गरजेचे आहे. केवळ एकच भाषा जास्त बोलणाऱ्या लोकसंख्येसाठी एक स्वतंत्र राज्याची संकल्पना बाबासाहेबांना मान्य नव्हती. आजही बिहारमधून आलेल्या लोकांना किंवा युवकांना महाराष्ट्रात किंवा आसाममध्ये विरोध होतो. याचे मूळ कारण विकासाचा असमतोल हे माहीत असूनसुद्धा आमची राजकारणी मंडळी प्रांतीय आणि भाषक वादावरच अधिक चर्चा करतात व मूळ प्रश्‍न बाजूला ठेवतात. बाबासाहेबांच्या मते, एकच भाषा बोलणाऱ्याची  जर विविध प्रांतांत विभागणी केली तर त्यांच्यात प्रांतीय व भाषिक अशी एक भावना निर्माण होणार नाही. परिणामी त्यामुळे राष्ट्राचा विकास चांगला होऊ शकतो. शिवाय जी मोठी राज्ये पुनर्रचना आयोगाद्वारा निर्माण केली आहेत, त्या राज्यांचीही लहान राज्यात निर्मिती करावी म्हणजे प्रशासकीय कामे सोपी होतील. शिवाय त्याच्या मनामध्ये राष्ट्राच्या एकात्मतेची भावना अधिक निर्माण झाल्यामुळे ती लहान राज्ये केंद्र सरकारला आव्हान देऊ शकणार नाहीत. म्हणून बाबासाहेबांनी लहान राज्ये निर्माण करावीत अशी सूचना राज्य पुनर्रचना आयोगास केली होती.



 


सुचविले क्रांतिकारी बदल-
 



 

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी १९२८ ते १९५६ या कालावधीत भारताच्या राष्ट्रीय एकात्मता आणि अखंडतेसाठी विविध क्रांतिकारी बदल सुचविले होते. ब्रिटिश कालावधीत बाबासाहेबांनी १९२८ मध्ये सायमन कमिशन पुढे साक्ष देताना भाषावार प्रांताची भूमिका फेटाळून लावली होती. त्याचबरोबर त्यांनी भीती व्यक्त केली. ती म्हणजे भाषावार प्रांतामुळे स्थानिक राष्ट्रवाद प्रांतीय किंवा विभागीयवाद व स्थानिक लोकांमध्ये स्वतःचे जे अस्तित्व आहे ते जोपासण्यासाठी चढाओढ लागेल व त्यामुळे भारताच्या स्थैर्याला आणि विकासाला खीळ बसेल. बाबासाहेबांनी भाषावार प्रांतरचनेला दोन कारणांसाठी विरोध केला होता. एक म्हणजे विभागीय जागरुकता निर्माण होऊन राष्ट्राच्या सुरक्षेला धोका निर्माण होऊ शकतो व दुसरे म्हणजे एकाच जातीच्या लोकांकडे राज्याची सत्ता किंवा सरकारे हस्तांतरित होऊ शकतात, असे बाबासाहेबांनी राष्ट्रहिताच्या दृष्टिकोनाचा विचार करून विचार मांडले होते व तेच आजही आपल्याला पूरक आहे. कारण आजही भारताच्या अंतर्गत सुरक्षेचा जेव्हा आपण विचार करतो, तेव्हा प्रांतीय व भाषावादामुळे किंवा राज्या-राज्यामधील सीमा प्रश्‍न, पाणीवाटप व केंद्र सरकारद्वारा दिली जाणारी आर्थिक मदत यावर विविध विरोधाभासी भूमिका आपल्याला आढळते. आजही काही राज्यांची सरकारे एका विशिष्ट जातीच्या गटाच्या लोकांकडेच आहेत.



 

बाबासाहेबांनी भाषावार प्रांतीय रचनेबाबत अशी मागणी केली, की भारतात सामाजिक आणि राजकीय समानता निर्माण करण्यासाठी उहशलज्ञी । इरश्ररपलशी ची गरज आहे. त्यांना अशी भीती वाटत होती, की नवीन भाषावार प्रांतीय रचनेत प्रगत जातीचे प्राबल्य जास्त असणार आहे व त्यांच्याकडेच राज्याच्या सत्तेचे केंद्रीकरण होणार आहे. त्यांनी मोठ्या राज्यांची संकल्पना मोडीत काढली व लहान राज्ये निर्माण करण्यासाठी सूचना दिल्या. त्यामुळे अल्पसंख्याक, दलित, आदिवासी व उच्च वर्गीय यांचे समान विभाजन होऊन राज्ये निर्माण झाली पाहिजेत, ही त्यामागची त्यांची भूमिका होती. बाबासाहेबांच्या प्रत्येक श्‍वासात भारताच्या राष्ट्राची सुरक्षितता आणि अखंडता याचा विचार होता. आजही दक्षिण भारत हा शैक्षणिक व सांस्कृतिक बाबतीत उत्तर भारतापेक्षा सरस आहे, त्याचे महत्त्वाचे कारण शिक्षण, प्रशासकीय व राजकीयदृष्ट्या तेथील राज्यांनी केलेले कार्य, हे विसरता येणार नाही. आजही "मराठी' भाषेच्या आणि प्रांताच्या अस्मितेचे राजकारण काही मंडळी करीत आहेत; परंतु जोपर्यंत सर्व भारतीय आपण एक आहोत असा सर्वसमावेशक दृष्टिकोन ठेवत नाहीत, तोपर्यंत खऱ्या अर्थाने भारत एक होणार नाही.




 

धन्यवाद- निशांत जाधव.


 

लेखं- डॉ.विजय खरे.


सरसकट सर्व ब्राह्मणांना दूषण लावणे हे अयोग्यच !!

सरसकट सर्व ब्राह्मणांना दूषण लावणे हे अयोग्यच !! 

 


 

मला समाजातील काही प्रवृत्तींचा विचार करता नवल वाटते. डॉ. बाबासाहेबांची चार पुस्तकं वाचून किंवा भगवान बुद्धाचे, कबिरांचे, ज्योतीबांचे ४ विचार वाचले कि त्यांना आपण फार मोठे झालो आहोत अथवा हे सगळे महापुरुष आपल्यालाच कळाले आहेत अशा अविर्भावात ते मग सरसकट सर्व ब्राह्मणांचा वा हिंदूंचा तिरस्कार करू लागतात, त्यांना दुषणे लावू लागतात आणि माझ्या मते ही समाजविघातक प्रवृत्ती आहे.





अगदी पूर्वकाळात सुद्धा होणार्या अन्यायावर लोक व धर्मक्षोभाची पर्व न करता परखडपणे मत मांडणारे, त्याला विरोध करणारे ब्राह्मण सुद्धा होतेच. त्याकाळात जसजसे शक्य झाले तसतसे याला विरोध करण्यात अशा ब्राह्मणांचा पुढाकार होता.डॉ. बाबासाहेबांच्या समीप असलेल्या लोकांत, चळवळीत सुद्धा ब्राह्मण होते, जे जन्माने ब्राह्मण असले तरी बाबासाहेबांच्या समतावादी विचारांनी पुरते प्रभावित होते. बुद्धाच्या भिक्खू संघात प्रचंड संख्येत ब्राह्मण होते, ज्यांनी विषमतावादी ब्राह्मण्य सोडून बुद्धाच्या वैज्ञानिक व समताधीष्टीत शिकवणुकीचा स्वीकार केला होता. परंतु ते केवळ ब्राह्मण आहेत किंवा तत्कालीन विषमतेचा पुरस्कार करणाऱ्या हिंदू धर्मातील लोक आहेत म्हणून बाबासाहेबांनी वा बुद्धाने त्यांना झिडकारले नाही..तर त्यांच्यातील बदलाचे स्वागत करून त्यांना आपलेसे केले, स्वतःच्या नातेवाईकाइतके प्रेम व आदर त्यांना दिला. छत्रपति शिवरायांनी सुद्धा जातीचा हा भेद आपल्या मावळ्यांमध्ये कधी केला नाही. कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णीला मारणाऱ्या शिवरायांनी बाजीप्रभू देशपांडे ब्राह्मण आहेत म्हणून त्यांचा तिरस्कार केला नाही. कारण जग तिरस्काराने नाही तर प्रेमाने जिंकता येते हीच या महापुरुषांची शिकवण.





त्यामुळे सरसकट सर्व ब्राह्मणांना दूषण लावणे हे अयोग्यच. असे करण्याने जे ब्राह्मण्याचा त्याग करून समाजात समता, बंधुता नांदावी यासाठी प्रयत्न करीत असतात, अशा माझ्या हिंदू व ब्राह्मण बंधूंवर अन्याय केल्यासारखा होईल. आपल्याला सर्वांना सोबत घेऊन एकसंध भारत घडवायचाय कुणाला दुखावून नाही. चांगल्याचे चांगुलपण स्वीकारायला शिका. त्याला जाती व धर्माची जोड देऊ नका.खरे भेदी हे ब्राह्मणेतर सुद्धा असू शकतात, त्यांना ओळखायला शिका. कारण, ब्राह्मण्य (म्हणजेच विषमता) ही सर्व जाती-धर्मातील लोकांत समान आढळते, त्यासाठी जन्मतःच कुणी ब्राह्मण असण्याची गरज नसते. जिथे ब्राह्मण्य आढळेल तिथे विरोध हा कडाडून व्हायलाच हवा, पण सरसकट तिरस्कार नसावा. तेव्हा धर्म हे बंधुभावाचे उगमस्थान असावे, द्वेषाचे नव्हे.





विशेष टीप: लेखाचा गर्भितार्थ जाणून घ्यावा. या लेखाचा अर्थ आम्ही पूर्वी झालेले अन्याय, इतिहास विसरलो आहोत किंवा कुण्या कारणाने त्याकडे कानाडोळा करत आहोत असा होत नाही.लेखाची मानवतावादी बाजू समजून घ्यावी आणि मगच प्रतिक्रिया द्यावी.



लेखं- गौरव गायकवाड.

'पुरोगामी' होणे म्हणजे काय..??

'पुरोगामी' होणे म्हणजे काय..??


 




स्वतःला 'पुरोगामी' विचारांचे म्हणवणाऱ्या माझ्या तथाकथित मित्रांना.... मैत्रिणींना.... माझे इतकेच सांगणे आहे कि, केवळ चार-चौघात आलो कि पुरोगामित्वाचे डोस देणे व मनातून वा घरात त्याच जुन्या बुरसटलेल्या विचाराचे पाईक असणे असे दुटप्पी वागणे आता बंद करा. बाहेर आल्यावर आम्ही कसे पुरोगामी विचाराचे? हे ओढून ताणून दाखवायचे नि घरात लग्न व शुभ कार्य असले कि, मुहूर्त पहायचे, पत्रिका बघायच्या, मंगळ-अमंगळ पहायचे, घरा-गाड्यांवर लिंबू-मिरच्या टांगायच्या तसेच केवळ ब्राह्मण वा खालच्या जातीतला आहे म्हणून समोरच्याला शिव्या घालताना स्वतः मात्र आपण 'क्षत्रिय किंवा वैश्य' (शेवटी चातुर्वाण्याचेच भाग) असल्याचा अवास्तव अभिमान बाळगायचा यालाच दुटप्पीपणा म्हणतात हे लक्षात घ्या. अशाने तुमच्या पुरोगामित्वाचा बुरखा टराटर फाटला जातो हे तुमच्या गावीही नसते; पण आम्हाला ते दिसते, जाणवते. ऐकिवात असलेला दुतोंडी साप मी प्रत्यक्षात पाहिलेला नाही परंतु अशा लोकांकडे पाहिल्यास ते खरेच अस्तित्वात आहेत याची जाणीव होते.




 

कुणी केवळ अमुक जातीचा वा धर्माचा म्हणून त्याचा राग वा कौतुक करू नका. आम्हाला ब्राह्मण विरोधी ठरवणाऱ्या महाभागांच्या लक्षात आले असेल कि नसेल हे आम्हाला माहित नाही, परंतु डॉ. दाभोलकर हे सुद्धा ब्राह्मण होते. परंतु त्यांच्या हत्येने आम्हाला झालेले दु:ख आम्ही शब्दांत व्यक्त करू शकत नाही. कारण दाभोलकर सर हे ब्राह्मण होते कि आणि कोणत्या जातीचे? याच्याशी आमचा काहीही संबंध नाही. पुरोगामी विचार स्वीकारलेला किंवा 'जुने जाऊ द्या मरणा लागुनी..." म्हणत आधुनिकतेची कास धरून त्याप्रमाणे चालणारा, चांगले बदल घडवून आणणारा माणूस हा 'आमचा' असतो... तोच सर्वांना 'आपला' वाटू लागतो. त्याला कोणती जात नसते, कोणता धर्म नसतो.. तो केवळ 'माणूस'च असतो... तुमच्या आमच्या सारखा..!!




 

तेव्हा 'पुरोगामी' होणे म्हणजे काय..?? तर माणसाला 'माणसाची' ओळख देऊन त्याला 'माणसासारखे' वागवणे होय, समानतावादी व विज्ञानवादी बनणे होय. कुणाचा जाणूनबुजून द्वेष करणे नव्हे..!!!!



विचार- गौरव गायकवाड(सोबत प्रबोधन टीम)

भटक्या- विमुक्त तरुणींचा संघर्ष !!

भटक्या-विमुक्त तरुणींचा संघर्ष !!




 जग वेगाने बदलते आहे. त्या बदलाचा रेटा उपेक्षित वंचित थरालाही बसतो आहे. विशेषत: भटक्या विमुक्तांची युवापिढी या बदलांना कशी सामोरी जातेय याचा शोध घेतला जायला हवा. या वर्गाला सामाजिक प्रतिष्ठा नाही, आर्थिक पाठबळ नाही, की परंपरागत शिक्षणाची शिदोरीही गाठीशी नाही. त्यांच्या  दिमतीला आहे फक्त भणंगपणा, असुरक्षितता, अभाव आणि कंगाली. दारिद्र्य रेषेखालील जगणे वाट्याला आलेल्यांची संख्या या समाजात ९४% आहे. केंद्र सरकारने २००६ साली नेमलेल्या रेणके आयोगाच्या सर्व्हेप्रमाणे ९८% लोक भूमिहीन आहेत. ७२% लोकांकडे रेशनकार्ड नाही. ९८% लोकांना बॅंकेचे अर्थसहाय्य मिळालेले नाही. हे लोक पालावर किंवा झोपडपट्तीत राहतात. त्यांचे हातावर पोट असते. त्यांच्या वाट्याला सदैव हिडीसफिडीस येत असते. हा देशातील सगळ्यात दुर्बल, दुर्लक्षित घटक असुन तो सर्वाधिक निरक्षर, गरीब आणि साधनहीन वर्ग आहे.




सोलापुरच्या आश्रमशाळांना जोडुन मुलांच्या उमलत्या वयात त्यांच्यामधील अंधश्रद्धा घालविण्यासाठी, निसर्गशेती आणि कष्टाच्या माध्यमातुन त्यांना स्वता:च्या पायावर उभे करणे, विचारी, विज्ञाननिष्ट बनविणे यासाठी "जीवन शिक्षण प्रकल्प" आम्ही राबवला. सुरुवातीला या उपक्रमात मुलींचा सहभाग नव्हता. आम्ही प्राधान्यक्रम बदलायचे ठरवले. उपक्रमात मुली याव्यात यासाठी खास प्रयत्न केले. हळुहळु यश येवु लागले. या शिक्षण उपक्रमातुन तयार झालेल्या १२ मुली पुढे शासकीय तंत्रनिकेतनमध्ये शिकायला गेल्या. त्यांनी आभियांत्रिकीचे उच्चशिक्षणही घेतले. त्या शिकल्या नी स्वत:च्या पायावर उभ्या राहिल्या. आता त्या मोकळा श्वास घेत आहेत. एका पिढीत त्यांनी घेतलेली ही भरारी ग्रामिण भागात कौतुकाचा विषय ठरली. या मुलींमधे जन्मजात उर्जा असतेच. संधी मिळाली की ती झेप घेते.
 



भटक्या प्रवृतीमुळे आईवडील एका गावी स्थीर नसल्याने मुलांचे शिक्षण होवु शकत नाही. त्यातल्या त्यात मुलींना शिकवण्याची तर कल्पनाच त्यांच्या मनाला शिवत नाही. मुली शिकल्यासवरल्या तर त्यांच्या लग्नासाठी अडचणी येणार अशी भिती मनात असते. या घटकांकडे बघण्याचा सर्वसाधारण समाजाचा दृष्टीकोनही ब-याचवेळा पुर्वग्रहदुषित असतो. त्यामुळे जिद्दीने कुणी आपल्या मुलामुलींना शिकवायचे व मुलांनी शिकायचे म्हंटले तरी कशी परवड वाट्याला येते त्याचे एक उदाहरण फ़ार बोलके आहे. परभणी जिल्ह्यातील सुमन भैरोबा पवार या पारधी जमातीच्या मुलीला तिच्या आईवडिलांनी शिकवायचे ठरविले. भटकेपणामुळे वेगवेगळ्या गावात शिकवावे लागले तरी त्यांची तयारी होती. जिल्ह्यातील गंगाखेड तालुक्यातील नरलाद गावच्या जिल्हा परिषदेच्या शाळेत इयत्ता पाचवीत तिचा प्रवेश घेतला. गावातील प्रमुख पालकमंडळी बिथरली, म्हणाली "पारधी मुलीच्या संगतीने आमची मुले बिघडतील. शाळेत पारध्यांची मुले मुली असताच कामा नये." सरपंच, पंचायत सदस्य, गाव पाटील व कर्तेधर्ते लोक यांनी मुख्याध्यापकांना निक्षून सांगितले की, पारधी मुलीला शाळेतून काढून टाका नाही तर आम्ही आमची मुले शाळेत पाठवणार नाही, मग शिकवा एकट्या पारध्याच्या पोरीला. अशा तर्‍हेने मुख्याध्यापकावर दबाव आणुन सुमन भैरोबा पवार या पारधी मुलीस जबरदस्तीने शाळा सोडल्याचा दखला देउन शाळेतुन काढुन टाकण्यात आले. लोकधाराच्या स्थानिक पदाधिकार्‍यांनी या प्रकरणाला वाचा फ़ोडली. आम्ही प्रक्ररण धसास लावायचे ठरवले. राष्ट्रीय आयोगाने राज्य शासनास या प्रकरणात लक्ष घालण्याची शिफ़ारस केली. विधानसभेत हा प्रश्न चर्चेस आला. संबंधितावर कारवाई करण्यात आली. सुमनची शाळा पुन्हा एकदा सुरु झाली पण दुस-या गावात. तिचे एक वर्ष वाया गेले. पुढे ह्या मुलीने जिल्हा पातळीवरील आंतरशालेय उंच उडी क्रिडास्पर्धेत प्रथम क्रमांकाचे पारितोषिक जिंकले. राज्यस्पर्धेसाठी तिची निवड झाली. सुमन म्हणते, "आमची गणती माणसात केलीच जात नाही. चळवळीमुळे आम्हाला आधार व न्याय मिळाला, नाहीतर काही खरे नव्हते." अशाप्रकारे शिक्षणाच्या संधी नाकारल्या गेलेल्या भटक्यांच्या लाखो मुली आज देशात आहेत.
 



चोरी करणे किंवा भिक मागणे हे नेहमीच वाईट आहे. पण चोरी केल्याशिवाय किंवा भिक मागितल्याशिवाय असंख्यांना जगताच येणार नाही अशी व्यवस्था असणे त्याहून जास्त वाईट समजले पाहीजे. दुबळ्यांचे शोषण करुन त्यांची भूक भागविणे आणि भूक वापरुन त्यांचे शोषण करणे हे परंपरेने चालत आलेल्या विषम समाजव्यवस्थेचे लक्षण आहे. आजही राजकारणी, जमिनदार, पोलिस व गुंड यांच्यापैकी काही लोक ही शोषणव्यवस्था मोठ्या खुबीने जपताना दिसतात. जन्मत: गुन्हेगार समजण्याचा कलंक ज्यांच्या माथी लागला आहे त्या तरुणांनी या सापळ्यातून बाहेर पडण्याचा प्रयत्न केला तरी पोलिस व गावगुंड ते विफ़ल करण्याचा प्रयत्न करतात.
 



आधुनिकीकरण, खाजगीकरण आणि जागतिकीकरण यावर आधारित विकासप्रक्रियेचाही त्यांच्यावर विपरित परिणाम झालेला आहे. राजस्थानमधील बनासकाठा येथील सरानिया जातीचे लोक सायकलवर फिरुन चाकुला धार लावायचे परांपरागत काम करीत असत. आजकाल या कामाची गरजच उरलेली नसल्याने स्त्रियांना नाईलाजाने पोटापाण्यासाठी समाजाला मान्य नसलेला रस्ता स्विकारावा लागला. त्या अप्रतिष्टीत व्यवसायात ढकलल्या गेल्या. टिव्ही, सिनेमा, यासारख्या करमणुकींच्या आधुनिक साधनांमुळे अनेकांचा परंपरागत व्यवसाय बुडाला. बहुरुप्यांचे सोंग घेऊन आपल्या अभिनय कौशल्याने लोकांची करमणुक करुन काही मुले पोट भरतात. काही तरुण साडी नेसून हिजड्याचे सोंग घेउन भिक मागतात. गेल्या जून महिन्यात नागपूरमधील कळमना भागात चार बहुरुपी तरुण भिक्षा मागायला गेले. त्यांना चोर समजुन वस्तीतील लोकांनी दिवसाढवळ्या दगडांनी ठेचुन मारले. तिघेजण जागेवरच मेले. अर्धमेल्या अवस्थेमधला एक पोलीसांच्या मदतीमुळे दवाखान्यातील उपचारानंतर कसाबसा वाचला. या हत्याकांडाची पुरोगामी महाराष्ट्रात साधी चर्चासुद्धा झाली नाही. भटक्या जमातींच्या संघटनांनी मोर्चे, निदर्शने, कॅंडल मार्च, शिष्ट्मंडळे इत्यदी मार्गांनी निषेध नोंदवला. केवळ संशयावरुन लोकांचा जमाव एव्हढा क्रुर कसा होतो? दिल्लीच्या बलात्कर प्रकरणात संतप्त तरुणाई रस्त्यावर आली. इथे भटक्या जमातींचे निर्दोष तरुण हकनाक मेले असताना मानवी हक्कासाठी लढणा-या अनेक संघटना गप्प राहिल्या. मिडियाबाबतही हाच अनुभव आला. एरव्ही पाचपाच लाखांची भरपाई देणार्‍या सरकारने या भटक्यांच्या गरिब बायकांना मात्र मोठया मुश्किलीने एक लाख रुपये दिले. या महिलांचे माहेर आणि सासर दोन्ही साधनविहिन. सरकार आणि समाज उदासीन. त्यांनी जावे तर जावे कुठे? मुलींची लग्ने लहान वयात झालेली असतात. पोरवडा वाढलेला असतो. २५ किंवा ३० वयाची मुलगी एव्हाना चारपाच मुलांची आई झालेली असते. नवर्‍याने सोडलेल्या मुली परित्यक्तेचे जिणे जगत राहतात. विधवा आणि परित्यक्ता यांची स्थिती फारशी वेगळी नसते. समाजात दैववादाचा पगडा असतो. अंधश्रद्धांचा बुजबुजाट झालेला असतो. जातपंचायती पुरुषप्रधान असतात. सगळीच मानसिकता पराभुत आणि परिस्थितीशरण असते. लाचारी, भणंगपणा यामुळे प्रबोधन, वाचन, चिंतन यांचा मागमुस नसतो.




ऐतिहासिक विकास प्रक्रियेत झालेल्या उलथा-पालथी व फेरबदल यांचा परिणाम म्हणून भटक्या जमातींच्या जगण्यातही अनेक बदल झाल्याचे स्पष्ट दिसते. जसे प्राचिनकाळी एकसंघ असलेल्या नाथ संप्रदायाचे डवरी गोसावी, नाथ जोगी, जोगी, गारपगारी, किंगरीवाले, भराडी असे वेगवेगळे गट पडले. मिळेल तो व जमेल तो मार्ग उपजिविकेसाठी स्वीकारण्यात आला. भटकत भटकत मुंबईत दाखल झालेल्या नाथपंथी डवरी गोसावी जमातीच्या लोकांनी स्टोव्हदुरुस्ती, छ्त्र्यादुरुस्ती, रद्दी कागदाचा व्यापार, भंगार गोळा करणे आणि विकणे तसेच परंपरागत पद्धतीने नाथाच्या-गोसाव्याच्या रुपात भिक्षा मागणे इ. व्यवसाय स्विकारले. व्यसानाधिन किंवा दुबळ्या पुरुषांच्या कुटूंबातील महिलांनी गायींच्या आधारे उपजिविका करण्याचा मार्ग स्विकारला.  ८० वर्षांपासून मुंबईत हा व्यवसाय चालू आहे. वेगवेगळ्या मंदिरांपुढे या महिला गाया घेवुन बसतात. देवदर्शनाला येणारे भाविक गाईच्या पुजेचे पुण्य पदरी बांधून घेण्यासाठी त्या बाईजवळचाच चारा विकत घॆवून त्या गायीला खावु घालतात. या कमाईवर त्या बाईचे घर चालते. मुंबईत  एक हजार कुटुंबे गायीवर जगतात. ते सगळे चेंबुर, घोडपदेव, शिवडीभागातील झोपडपट्ट्यात राहतात. ह्या गाया दुधवाल्या भय्यांकडुन भाड्याने आणलेल्या असतात. या महिलांच्या घरातील तरुण व्यसनाधिन किंवा बेरोजगार आहेत. शिक्षणाच्या अभावामुळे त्यांना काही भविष्यच नाही. मुंबईचे शांघाय करायला निघालेल्या मुंबई महापालिकेने MCGM 441 C Rule (Impounding of Cattle) या नियमाप्रमाणे या गायवाल्या महिलांच्या पोटावर पाय द्यायला सुरुवात केली अहे. मंदिरापुढे गायी घेउन बसलेल्या या महिला गायी घेउन परत जाताना ती जागा स्वच्छ करुन किंवा सारवून जातात. दिवसभर रहदारीला, लोकांना, भक्तांना त्रास होणार नाही अशारितीने एका कडेला बसलेल्या असतात. तरीपण गाई जप्त करुन त्यांच्यावर खटले भरले जातात. दहा हजार रुपयांचा दंड या महिलांना केला जातो. एवढी मोठी रक्कम त्यांना परवडत नाही. दुधवाल्या भय्यांकडुन घेतलेल्या गायी तर परत कराव्याच लागतात. त्यामुळे ही सारी कुटूंबे जबर व्याजाच्या कर्जाखाली दबलेली आहेत. या महिलांच्या व्यवसायाला अभय देवून त्यांच्या कुटूंबातील इतर मुलामूलींना योग्य त्या कौशल्याचे प्रशिक्षण देवून त्यांना उद्योग व्यवसायासाठी संधी व साधने पुरविली तर येत्या ५/१० वर्षात त्यांना मंदिरापुढे गायी घेवून बसण्याची गरज भासणार नाही. स्वातंत्र्यपूर्व काळापासून मुंबईत पाल किंवा झोपडीत राहणा-या या कुटुंबाना हक्काचे घर आणि एक पर्यायी व्यवसाय मिळणे हे त्यांचे निकडीचे व ऐरणीवरचे प्रश्न आहेत.




महाराष्ट्र शासनाला सादर केलेला बारबाला संदर्भातला सामाजिक कार्यकर्त्या अ‍ॅड. वर्षा काळेंचा सर्व्हे सांगतो की, ८०% बारबाला ह्या नट, राजनट, डोंबारी, कोल्हाटी, बेडीया, सरानिया, कालबेलिया, कबूतरा, पेरणा इ. साधनविहिन भटक्या जमातीतून आलेल्या आहेत.  ठिकठिकाणी विखूरलेल्या या जमातींच्या कुटूंबाना पोसण्याची जबाबदारी या बारबालाच पार पाडतात. डान्सबार बंद केले गेले. पण  बेकार झालेल्या बारबालांच्या निराधार कुटूंबियांना सन्मानाने जगण्याचा मार्ग व साधने पुरविली गेली का?




भटक्या जमातीतील निरक्षर महिलांच्या कर्तृत्वाचा एक उत्साहवर्धक अनुभव आहे. सोलापूर येथील निसर्गेशेतीच्या प्रयोगात  दोन महिलांचा सहभाग आहे. या प्रयोगाला महाराष्ट्र शासनाचा ’सेंद्रिय शेतीचा शिल्पकार’ हा किताब मिळाला आहे. या महिलां म्हणजे शेती क्षेत्रातल्या प्राध्यापक आहेत असे प्रयोगास भेट देणारे अनेक शेतीतज्ञ मानतात. त्या त्यांचे अनुभव व आकलन त्यांच्या भाषेत समजावून सांगतात. प्रत्यक्षात हुकमी व विक्रमी उत्पादन काढतात. तरुणींच्या व महिलांच्या हातात जादु आहे. त्या मेहनती व प्रतिभावंत आहेत. त्यांना योग्य प्रशिक्षण, संधी व साधने दिल्यास सर्वांचेच भविष्य उज्वल आहे.




या समाज घटकात भिन्न व्यवसाय, भिन्न भाषा, भिन्न देव-देवता आणि जातपंचायतीचे भिन्न नियम असून त्यांच्यात जाती व्यवस्थेची उच्च-निचता पूरेपूर भरलेली आहे. रस्त्यावर भिक्षा मागून जगणा-या या जमातीच्या तरूणींना दिल्लीच्या तक्तावर कोणा पक्षाचा कोण माणुस बसलेला आहे याचे काहीही सोयरसुतक नसते. कॉंग्रेस, भाजपा, कम्युनिस्ट या पक्षांच्या विचारधारा, सामाजिक मतप्रवाह, फ़ॅशन, आधुनिकता,स्त्रीमुक्ती, मानवी हक्क यांची बर्‍याचजणींना प्राथमिक ओळखही नसते. अशा तरुणींचे संघटन करणे अत्यंत कठिण असले तरी गरजेचे आहे. देशातील या जमातींची लोकसंख्या सुमारे १३.५ कोटी असुन त्यातल्या सात कोटी महिला आहेत. यात सुमारे चार कोटी एव्हढ्या मोठ्या संख्येने असणार्‍या तरुणींबद्दल बोलताना सरसकट विधाने करणे अवघड अहे. सर्वत्र दिसणारा कल  आणि प्रातिनिधिक चित्र रेखाटायचा हा प्रयत्न आहे.
 



लोकशाही संघटित व जागृत समाज घटकांना न्याय देते. शासनाचे लक्ष प्रभाविपणे वेधून घेण्यासाठी देशभरातील सर्व जमातींच्या वेगवेगळ्या संघटनांना एकत्र करुन एक सामुहिक व्यासपीठ उभारावे ही कल्पना पुढे आली. तरुणतरुणींच्या पुढाकारातुन "लोकधारा राष्ट्रिय समन्वयाची" निर्मिती करण्यात आली. ही नॅशनल ऍडव्हायझरी कौन्सिल, केंद्रीय नियोजन आयोग तसेच सामाजिक न्याय मंत्रालय यांना तळातल्या वास्तवाची माहिती व तज्ञ सल्ला पुरविणारी देशातील १८ राज्यात कार्यरत असलेली संघटना आहे. भटक्या-विमुक्त समाजातील तरुणतरुणींमध्ये आत्मविश्वास निर्माण करुन त्यांना श्रम व प्रतिष्टेवर आधारित व्यवसाय परिवर्तनाकडे नेणे, गुन्हेगारीचा शिक्का पुसणे आणि संघटित शक्तीच्या जोरावर त्यांना राजकीय निर्णयप्रक्रियेचा घटक बनविणे, विकासाची व्यापक दृष्टी देणे, नेतृत्व विकासासाठी प्रयत्न करणे यावर संघटनेचा भर आहे.
 




या समाजातील काही तरुणी आणि महिलांची उदाहरणे बघितली की त्यांच्या जगण्यातील आजची गुंतागुंत आणि संघर्षगाथा कळते. गंगु भटक्याविमुक्तातील मुंबई महानगरात राहणारी एक तरुणी. केंद्र सरकारच्या उपक्रमात नोकरी करणारी. भटक्यातल्याच पण वेगळ्या जातीच्या तरुणाच्या प्रेमात पडलेली. मुलाला पदवीधर असुनही चांगली नोकरी नसल्यामुळे तिच्या या लग्नाला घरच्यांचा विरोध होता. पण ती ठाम होती. तिने निर्धाराने हे लग्न केले. पुढे मुलाला चांगली नोकरी मिळाली. दोघेही सामाजिक परिवर्तनासाठी झोकुन देवुन काम करु लागले. स्वत: सन्मानाचे जीवन जगत त्यांनी एक  संघटना उभारुन तिच्यामार्फत अनेकांचे संसार उभे केले.देशातील सर्वाधिक असंघटित असणार्‍या व विखुरलेल्या या जातीजमातींना एकत्र करण्यासाठी मंच निर्माण केला.




क्षमाली एका लेखकाची, नेत्याची मुलगी. तिचे वडील बंडखोर आणि मनस्वी होते. ते नोकरीत असताना सामाजिक अन्यायाचे बळी ठरले. नोकरी गमवावी लागली. सहा बहिणी आणि एका भावाला सांभाळण्याची जबाबदारी अचानकपणे क्षमालीच्या अंगावर आली. लहान वयात परिक्षा बघणारी बरीच संकटे आली तरी मोठ्या जिद्दीने आणि हिंमतीने तिने घर सावरले. रांगेला लावले. तिचे हे धाडस अनेक मुलींना प्रेरणादायी ठरले.




सीमा एक नृत्यांगना आणि रंगकर्मी.  करियर उभारण्यासाठी मेहनत घेणारी.तिने आवडलेल्या मुलाशी घरच्यांच्या विरोधात जावुन लग्न केले. नोकरी, संसार, घर चालवण्यासाठी तिची सतत धडपड चालु असते. लहानपणापासुन नास्तिक घरात वाढलेली असुनही पती आणि सासरच्या मंडळींसाठी सारे देवधर्म सांभाळताना तिची तारांबळ होत असते.




श्वेता एका मेंढपाळ कुटंबातल्या पत्रकाराची मुलगी. ग्रामीण भागात वाढलेली, शिक्षण घेतलेली. पुढे उच्च शिक्षणासाठि मुंबईत आलेली. सामाजिक विज्ञानाचे उच्चशिक्षण घेतानाच एका होतकरु दलित मुलाच्या प्रेमात पडली. जिद्दिने विवाह करुन आता नॊकरी व संसार करणारी.बहिणीच्या उच्च शिक्षणासाठी माहेर आणि नवर्‍याच्या पुढील शिक्षणासाठी सासर अशा दोन्हींना बळ देण्यासाठी कार्यरत असलेली.





संगिताचा विवाह एका डॉक्टरशी झाला होता. तिचा नवरा लेखक नी कार्यकर्ता होता. त्याचे लेखनामुळे जसजसे नाव होवु लागले तसतशी डोक्यात हवा जावु लागली. आर्थिक कमाईसाठी कष्टांऎवजी कर्जाचे डोंगर उपसण्याकडे कल वाढु लागला.थातुरमातुर उद्योग उभे करण्यात आले. लवकरच देणेकर्‍यांचा तगादा चुकवण्यासाठी परागंदा होण्याची वेळ आली. त्यातच अकाली अपघाती मृत्यू झाला. नवरा वारला तेव्हा संगिताच्या पदरात एक मुलगा होता.विवाहामुळे संगिताचे शिक्षण अर्ध्यावरच सुटलेले होते. तिने ते पुन्हा सुरु  केले. चांगली नोकरी मिळवली. मुलाला शिकवले. पुढे एका चांगल्या अधिकार्‍याकडुन तिला लग्नाची मागणी आली. पण मुलाच्या भवितव्यासाठी तिने पुनर्विवाह करायचा नाही असा निर्णय घेतला.





मराठवाड्यातील सलमा. तिची आई भटक्याविमुक्त समाजातील तर वडील ब्राह्मण.प्रागतिक विचारांचे आईवडील सार्वजनिक कामात रमलेले. दुर्धर आजाराशी झुंझताना वडील अकाली गेले. सलमाने उच्च शिक्षण घेवुन.एका सामाजिक कार्यकर्त्याशी विवाह केला. आईवडीलांचा सामाजिक कामाचा वारसा चालु ठेवला. तिची बांधिलकी सेक्युलर विचारधारेशी आहे.





विमलताईचे आत्मकथन लक्ष वेधुन घेणारे ठरले.ती गावखेड्यातुन शहरात आलेली. नवर्‍याच्या प्रोत्साहनामुळे शिकली.लेखिका झाली.





किरण एक गरिब तरुणी. स्पर्धा परिक्षेत यश मिळवुन उपविभागीय अधिकारी झाली. परंपरेने नाचगाणे करुन पोट भरणार्‍या कोल्हाटी समाजातील ही मुलगी आज उत्तम प्रशासकाचा पुरस्कार मिळवते हे तिचे यश अभिमानास्पदच म्हटले पाहिजे.




सारिका एका विस्कळीत कुटुंबातील मुलगी. आईवडील भुकंपात वारले. नर्स असलेल्या मोठ्या बहिणीने तिला शिकवले. सारिकाने जिल्हा परिषदेत नोकरी मिळवली. तिच्यापेक्षा कमी शिकलेल्या एका मुलाशी तिने  प्रेमविवाह केला. नवर्‍याला पुढे ५ वर्षांनी चतुर्थ श्रेणीतील नोकरी मिळाली. सारिकाच्या बहिणीची मात्र शोकांतिकाच झाली. सगळ्या कुटुंबाची जबाबदारी पेलतापेलता तिची फार परवड झाली. शोषण झाले.




भिक्षेकरी समाजातील दिगंबर आणि त्याची बायको अनुसया यांनी महापालिकेची निवडणुक लढवण्यासाठी खुप वर्षे मेहनत केली. वा‘र्ड बांधला. वा‘र्ड ओबीसी महिलांसाठी राखीव झाल्याने अनुसया खुष होती.ती निवडुन येणार असा तिला आत्मविश्वास होता. रातोरात चक्रे फिरली. सत्ताधारी जातीच्या एका बाईंनी जातीचे खोटे सर्टिफिकेट मिळवुन आरक्षणात घुसखोरी केली.जातीची व्होटबं‘क वापरुन बाई अल्पशा बहुमताने निवडुन आल्या.न्यायासाठी अनुसयाने उच्च न्यायालयाचे दरवाजे ठोठावले.तात्रिक प्रक्रियेत ५ वर्षे आरामात निघुन गेली.भटक्यांच्या ताटातला घास पळवण्यात आला. न्याय मिळेपर्यंत ५ वर्षे संपुन गेली होती.





अलकाताई आणि उज्वलाताई या राजकिय पक्षात काम करणार्‍या तरुणी.महत्वाकांक्षी,मेहनती. महिला आरक्षणामुळे अलकाताईला महत्वाच्या पदावर जावुन निर्णयप्रक्रियेत सहभागी होण्याची संधी मिळाली.





या समाजातील बहुतेक तरुणींना घरातील तसेच सामाजिक निर्णयप्रक्रियेत काहीच स्थान नसते. उपजिविकेसाठी जिवनाधारच नसल्याने जगणे सैरभैर असते. महिलांचे तर माहेर आणि सासर दोन्ही साधनविहिन असतात. हक्काचे घर नाही, सामाजिक प्रतिष्टा नाही. भविष्याची कोणतीही तरतुद नाही.अशा हिंदोळ्यावर जगताना पुरुष व्यसनी बनतात. बायकांना मारहाण करु लागतात. उत्तरप्रदेशातील बुंदेलखंडमधील मेंढपाळसमाजातील संपत पाल या महिलेने या कौटुंबिक हिंसाचाराला आळा घालण्यासाठी "गुलाबी गॅंग" स्थापन केली. मार खाणार्‍या महिला एकत्र आल्या आहेत. प्रेमाने सांगुनही जे नवरे ऎकत नाहीत त्यांना संघटनेच्या माध्यमातुन चोप देण्याचा कार्यक्रम केला जातो. आज या संघटनेच्या २२००० हजार सदस्य आहेत. यावरुन कौटुंबिक हिंसाचाराचा प्रश्न किती भयावह आहे त्याची कल्पना येवु शकेल. भटक्या समाजातील एक महिला पुढाकार घेते आणि तिचे एका चळवळीत रुपांतर होते ही घटना महिला चळवळीसाठी ल्क्षणीय होय.





ही काही अपवादात्मक उदाहरणे बघितली की अशा अंधारमय परिस्थितीतही परिवर्तनाची चाहुल लागते. हा तरुणींचा बदलता चेहराच उद्याच्या भारताचा नकाशा उजळवुन टाकु शकेल.





संदर्भ- http://pallavi-renake.blogspot.in/2013/07/blog-post_31.html




लेखं- अ‍ॅड. पल्लवि रेणके.


एक संवाद !!


एक संवाद !! 





ट्रेन मध्ये प्रवास करत असताना आमच्या मित्रा समवेत घडलेला हा प्रसंग आहे, ट्रेन मध्ये तीन मुस्लिम प्रवासी होते त्या तिघांपैकी एक जण बाकीच्या दोघाना शिकवण देत होते "बेटा , सब अल्लाह के भरोसे छोड देना चाहिये ! अल्लाह मालिक"


 


आमचे मित्र हि हे सर्व कान देऊन ऐकत होते हे पाहून शिकवण देणाऱ्या व्यक्तीने अधिकच उत्साहाने सांगायला सुरुवात केली. तेव्हा आमचे मित्र म्हणाले  "मै नही मानता तुम्हारे अल्लाह को !" त्यावर ती व्यक्ती म्हणाली "तो फिर तुम काफिर हो"


 


आमचे मित्र म्हणाले "हा तुम ऐसा कह सकते हो , लेकिन एक बात बताओ जब कुराण मे लिखा हुआ है की जो खुद कि मदत करता है अल्लाह उसीकी मदद करता है ! अगर खुद कि मदत हमे हि करनी है तो सब अल्लाह के भरोसे कैसे छोड सकते है ! दुसरी बात जब भारत आझाद नही था तब सांसद मे मुस्लीमो का प्रतिनिधित्व तीस प्रतिशत था और आज आझाद भारत में यह डेढ प्रतिशत है ! तो क्या अल्लाह के उपर छोड देने से यह समस्या हल हो सकती है ? "त्या व्यक्तीने विचारले" तो क्या अल्लाह को नही मानना चाहिये ? आमचे मित्र म्हणाले... अगर इन्सानियत बरकरार रखने के लिये अल्लाह कि जरुरत है तो अल्लाह को जरूर मानना चाहिये ! अगर इन्सानीयत के लिये अल्लाह कि जरुरत हि नही है तो अल्लाह को क्यो माने ? और इतिहास गवाह है की सबसे ज्यादा इन्सानियत का काम उन लोगो ने किया है जो अल्लाह यां ईश्वर को नही मानते थे ! वह चाहे कबीर हो, गौतम बुद्ध हो, महात्मा फुले हो या बाबासाहेब आंबेडकर"


 



अंधश्रद्धा, चुकीच्या आणि गलिछ चालीरीती, देवभोळे लोकांचे आर्थिक शोषण या सगळ्या अमानुष गोष्टींसाठी देवाची निर्मिती करणारे आणि पोथी पुराणात सामान्य लोकांना अडकवून ठेवणाऱ्या लोकांनी माणुसकी निर्माण केलीय का? कि भारतात सर्वात आधी मुलींची शाळा काढून स्त्रियांना शिक्षित करण्याचे ध्येय बाळगणार्या महात्मा फुले, वर्षानुवर्ष जनावरां सारखे आयुष्य जगणाऱ्या माणसांना माणसात आणण्याचे आणि स्त्रियांना खर्या अर्थाने कायदेशीर समानत्व मिळवून देणाऱ्या बाबासाहेब आंबेडकर यांनी माणुसकी निर्माण केली ??





लेखं- मनीषा भोळे.

सर्वानीच तथागत व्हावं असं नाही, पण त्याची वाट चालावी- एकनाथ आवाड.

सर्वानीच तथागत व्हावं असं नाही, पण त्याची वाट चालावी -एकनाथ आवाड.








मी जन्मानं एकनाथ दगडू आवाड. माझे आईबाप मांग. धर्मानं हिंदू. माझ्यावर धाडले गेलेले मारेकरीही मांग. धर्मानं हिंदू . समोर कुणीही असू दे पार्था, हत्यार उचल. मारणं- मरणं हे तुझ्या हाती. पाप-पुण्याचा हिशोब मी करेन.… असं तत्त्वज्ञान सांगणारा हिंदू धर्म. मनुष्य व्यवहारांना अठरा लक्ष योनींच भय घालणारा. गुलामांची कप्पेबंद चळत उभारणारा हिंदू धर्म.





याच धर्मानं माझ्या मायबापाला कष्टात खितपत ठेवलं. याच धर्मानं माझ्या जातीला शिक्षणापासून लांब ठेवलं, गुन्हेगारीसाठी प्रवृत्त केलं. मी तो मार्ग नाकारला. माझी वाट चालत इथवर आलो. जातीशी भांडलो, जातीबाहेरच्यांशी भांडलो. कार्यकर्ता झालो, नेता झालो. माझ्यातल्या उर्मीनं मला इथवर आणलं. पण मग माझ्यावर हल्ला करणारे गुन्हेगार का झाले ? माझं आयुष्य घडलं तसं त्यांचं का घडू शकलं नाही ? का त्यांना पैशांची भुरळ पडली ? कारण त्यांना सतत ' मांग ' ठेवण्यात आलं ? कुणी ठेवलं ? या समाजव्यवस्थेनं. नव बौद्धांनीही मांगांना आपलं मानलं नाही. वेगळं वागवलं म्हणून ते भरकटले. मग आमच्यासाठी खरा मार्ग कोणता ? मुक्ती कोण पंथे ? अर्थात बाबासाहेबांनी दिलेला मार्गच खरा अक्षय मार्ग. ती वाट कुठे जाते ? बुद्धाकडे. मनात विचार येऊ लागला - मी बौद्ध धर्म स्वीकारावा का ???





 


मी तर आधीपासूनच मनानं बौद्ध आहे. १९७८ साली मी मुलाचं नामकरण 'मिलिंद' असं केलं तेव्हा मनानं बौद्धच होतो. पुढं पोतराज वडिलांचे केस कापले, घरातले देव नदीत फेकले, तेव्हा माझा धर्म कोणता होता ? बौद्धच ! मनुष्य बौद्ध होतो म्हणजे काय होतो ? राम- कृष्णाची पूजाअर्चा सोडून भगवान बुद्धाची आराधना करू लागतो ? बुद्ध तसबिरीत, मूर्तीत, लेण्यांमध्ये कुठे असतो ? बुद्धगया हे का बौद्धाचं तीर्थक्षेत्र ? भंतेजी हे बौद्धांचे भटजी ? नाही, असं नाही. बुद्धाला तथागत हि उपाधी आहे. म्हणजे एक विशिष्ट अवस्था सातत्याने धारण केलेला ; राग, लोभ, मोह, मत्सर यांपासून अलिप्त बुद्ध. बुद्ध हा कर्ता विचारवंत. बाबासाहेबांनी आम्हाला दिलेला बुद्ध जीवनसंमुख आहे. तो सामाजिक प्रश्नांची उत्तर शोधतो, प्रश्न सोडवण्याचा मध्यममार्ग सांगतो. बुद्ध म्हणजे आपलं पूर्ण उमललेलं रूप. म्हणूनच बुद्धांची प्रतिमा पूर्ण उमललेल्या कमळ पाकळ्यांवर बसलेली असते.



 


बुद्ध देवळात नसतो, तीर्थक्षेत्रात नसतो, लेण्यांमध्येही नसतो. बुद्ध आपल्या अंतरात असतो. बीजात सुप्त अंकुर असतो त्याप्रमाणे बुद्ध आपल्यात असतो. या अंकुराची रूपं निरनिराळी. आपली मुलंबाळं सांभाळणं, त्यांना सुशिक्षित करणं, योग्य मार्गान उदरनिर्वाहाची वाट दाखवणं, गरिबी असली तरी टुकीचा संसार करणं, दारू- व्यभिचारापासून लांब राहणं, न्यायासाठी लढण, विषमतेला समाजजीवनातून हद्दपार करू पाहणं, आपल्यातील प्रज्ञा - शील - करुणा या जाणीवा हळूहळू विकसित करणं म्हणजे आपल्या आतील बुद्धाला उमलण्याची संधी देणं, बहुसंख्य महार जात या वाटेनच पुढं गेली. उत्कर्ष करती झाली. मांग जातीनं हि वाट का स्वीकारू नये ???









 

सर्वानीच तथागत व्हावं असं नाही, पण त्याची वाट चालावी, म्हणजे आपण मनुष्यत्वाला तरी गाठू शकतो. मी मनानं बुद्धाची वाट चालत आलोय, म्हणूनच हा विचार मला सुचतोय.


 


लेखक- एकनाथ आवाड.





'जग बदल घालूनी घाव' एकनाथ आवाड याच्यां आत्मचरित्रातून साभार.


 


धन्यवाद- जितेंद्र माने.


नक्की  हा VIDEO बघा- 




IBN LOKMAT Great Bhet Eknath Avad Part 1


http://youtu.be/huGYcnaS61I
 
 


IBN LOKMAT Great Bhet Eknath Avad Part 2 


 http://youtu.be/nrnWNRPRzX8
 

छत्रपती शिवाजी महाराज

ज्या काळी स्वातंत्र्याचा विचार करणंही जीवघेणं ठरायचं , त्या काळी ५ पातशाह्यांना तोंड देत हिंदवी स्वराज्याला स्वत:चं सिंहासन बहाल केलं ते छत्...